सांझ ढलते ही, हर व्यक्ति एक दूसरी परछाईं डालता है — एक ऐसी जो पुरानी हँसी, खोए हुए कमरों, और उन चेहरों के साथ चलती है जिन्हें वे भूल गए थे। हवा विद्युत-सी और ठंडी हो जाती है, जब ये अँधेरे प्रतिरूप धूल और चाँदनी में फुसफुसाते हैं, मानो स्मृति ने ही एक देह पा ली हो। एक अकेला कदम पूरे बचपन को फिर से खोल सकता है।
क्या होगा अगर परछाइयाँ हमें याद रखें?
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